मेरो नाम गाई हाय जादू कियौ मन में।
नटखट नवल सुघर नन्दनवन में
करि कै अचेत चेत हरि कै जतम मैं।
झटपट उलटि पुलटी परिधान,
जानि लागीं लालन पे सबै बाम बन मैं।
रस रास सरस रंगीली रसखानि आनि,
जानि जोर जुगुति बिलास कियौ जन मैं।
गोपी अपनी सखि से कहती है कि कृष्ण ने अपने अधरों से रस पिला कर जब बाँसुरी में मेरा नाम भर कर बजाया तो मैं सम्मोहित हो गई। नटखट युवक कृष्ण की इस शरारत से अचेत मैं हरि के ध्यान में ही खो गई। और बांसुरी के स्वर सुन हर गोपी को लगा कि उसे कृष्ण ने बुलाया है तो सब उलटे सीधे कपडे ज़ल्दी जल्दी पहन, समय का खयाल न रख वन में पहुँच गईं। तब रंगीले कृष्ण ने वहाँ आकर रासलीला की और नृत्य संगीत से आनंद का वातावरण बना दिया।
1 comment:
प्रिय अनिल ,आज एक लेख ज्यों की त्यों धर दीनी पर लिखा है आप उसको पढ़ कर उसके आलोचना और उसके विरोध में कोई तथ्य रखेंगे तो मुझे खुशी होगी / रसखान के बाद क्या आपकी और कोई प्रस्तुती नहीं है हो तो अवगत करावें
Post a Comment